Tuesday, 26 July 2011

जीतेंगे हम


जीतेंगे हम,
पहुँचेंगे फिर उसी ठौर
आएगा जीवन मे फिर से
अच्छा दौर.....

क्या हुआ जो आज हैं
बेचैन रातें
क्या हुआ की हो किसी ने
चुभती बातें
आएगी सुबह ,फिर से लेके
मौका और......

पेडों ने कब पतझड पर
आंसू बहाए
पंछी कब टूटे नीडों से
हार पाए
शाख़ों पर आएँगी कोंपल
पत्ते- बौर........

मौन कभी तन्हा बैठा है
सोचा है?
परछाई रहती है हरदम
देखा है?
दुख मे साथ वही रहती है
करना गौर.................

 जीतेंगे हम, पहुँचेंगे फिर उसी ठौर

क्या कहें क्या ना कहें



क्या कहें क्या ना कहें
गीत बन ढलते रहें

श्रम से भीगी जो हो सांसे ,
वक़्त  खेले  उल्टे  पांसे
मंज़िलें  कदमो में  होंगी
शर्त बस - चलते रहें
क्या कहें क्या ना कहें.....

राह जब दुश्वार होगी
जीत होगी ,हार होगी
जिस्म की इमारतों मे
ख़्वाब बस, पलते रहें
क्या कहें क्या ना कहें.............

एक धुन्धली सी किरण है
रिश्तों मे जो आवरण है
सांस की गर्मी से अपनी
मोम से गलते रहें
 क्या कहें क्या ना कहें.........

आज हमने फिर से पाई ज़िन्दगी


आज हमने फिर से पाई ज़िन्दगी
आज हमने फिर से उनसे बात की

खुल रही थी राज़ की परते जहाँ
था अन्धेरा, रोशनी की बात की

ज़ख़्म जो पावों को पत्थर ने दिए
उनसे फ़ूल और पत्तियों की बात की

हाथ मे जो लोग थे खंजर लिए
हमने उनसे आदमी की बात की

जो खडे  थे राह मे तन्हा कहीं
हमने उनसे हमसफ़र की बात की

टूटते चेहरों को फ़िर से जोडने
हमने उनसे ज़िन्दगी की बात की

मेरा, छूट गया गाँव.


सुविधा के मोह में
बहक गए पाँव
मेरा, छूट गया गाँव.......

गोबर से लिपा पुता रहता था आँगन
खुशियाँ ही खुशियाँ तब लाता था सावन
जीवन अब अस्त-व्यस्त
सर पे नही छाँव
सुविधा के मोह में.........................

शहर सारा बेगाना, सर पे नहीं  साया
सुख मे जो साथ रहा, दुख में ना आया
ना ही बचा ठौर कोई
ना ही कोई ठाँव
सुविधा के मोह में.......................

रोजी के लाले हैं, पाँवों मे छाले
सुलझाए , सुलझे ना, उलझन के जाले
जीवन मे लगने लगे
रोज़ नए दाँव
सुविधा के मोह में..........................

तुम्हारी याद तो आई बहुत है.


तुम्हारी  याद तो आई बहुत है..............

जहाँ हर द्वार दरबानों के पहरे ,
चमकती गाडियां,बंगले सुनहरे,
वहाँ रिश्तों में  तनहाई बहुत है.
तुम्हारी  याद तो आई बहुत है.........
                       
नदी चुप है और सागर बोलते हैं,
सभी दौलत से सपनें तौलते हैं,
हाँ,मंजिल भी तमाशाई बहुत है
तुम्हारी  याद तो आई बहुत है.........

नकाबों से ढंके है सारे चेहरे
छुपा रक्खे हैं सबने राज गहरे,
है इंसा एक ,परछाई बहुत हैं.
तुम्हारी  याद तो आई बहुत है..........

 दिखाने के बचे सब रिश्ते -नाते,
 जुबां पर हो भले ही मीठी बातें ,
 यूँ, संबंधों में तो खाई बहुत है .
 तुम्हारी  याद तो आई बहुत है...........

जुबां है मौन ,मंज़र बोलते हैं,
यहाँ इमां ज़रा में डोलते हैं,
सच की राहों पे तो काई बहुत है.
तुम्हारी  याद तो आई बहुत है

गज़ल


बिछड़ जाते हैं जिनके दिल मिले हैं,
मुहब्बत के  यही तो सिलसिले हैं.

किया है प्यार पहले से जियादा,
बिछड़ के जब ख्यालों में मिले हैं.

कुरेदें आओ मिलकर ज़ख्म दिल के,
हुआ क्या जो वो पहले से छिले हैं.

हुए हैं बेखबर खुद से जो यारों,
सुना है बस  खुदा उनको मिले हैं.

चलो बैठें करें कुछ मीठी बातें,
भुला दें आज जो शिकवे -गीले हैं.

कहूँगा मौन रहकर बात दिल की,
पता मुझको है मेरे लब सिले हैं.

कुछ मंज़िलों तक पहुँचे ,कुछ राहों मे


कुछ मंज़िलों तक पहुँचे ,कुछ राहों मे बिखर गए
जाने कितने मुसाफ़िर ,  इन राहों से गुज़र गए

भागती  फिरती  रही ,    डर से सहमी हवा
जब तक न आँधियाँ थमी , तूफाँ गुज़र गए

दर्द की बस्ती मे कैसा जश्न कैसी ये खुशी
जब कभी  रोटी मिली,  चेहरे निखर गए

उम्र भर के सिलसिले ,शब्द के साँचों मे ढल
शक्ल बनकर , गीत  गज़लों मे  संवर गए

कैसी थी पतवार, कश्ती, वो भंवर, वो दास्ताँ
क्या पता उनको, जो साहिल पर उतर गए

भूल कैसे जाएँ जो ,ताउम्र फ़ूलों से रहे
मौन रहकर भी जो ,खुशबू से बिखर गए
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